दक्षिण कोलकाता में हरीश मुखर्जी स्ट्रीट पर स्थित TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के चार मंजिला आलीशान आवास ‘शांतिनिकेतन’ के बाहर 11 मई को एक बेहद अजीब नजारा देखने को मिला. वहां दो व्यक्ति पहुंचे, जिनमें से एक ने अपने चेहरे पर अभिषेक बनर्जी की बड़ी तस्वीर लगा रखी थी और उसकी कमर में रस्सी बंधी हुई थी.
उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर नाटक करते हुए कहा, ‘मैं, अभिषेक बनर्जी, ये स्वीकार करता हूं कि मैंने कोयला चुराया, गाड़ियां चुराईं, बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों की मदद की और संदेशखाली में हिंदू महिलाओं पर अत्याचार होने दिए.’
इसके बाद वो शख्स घुटनों के बल बैठ गया और वहां जमा राहगीरों से माफी मांगने लगा. ये घटना पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी के टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने के ठीक एक सप्ताह बाद की है.
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क्यों टारगेट पर हैं अभिषेक बनर्जी?
15 साल तक एकछत्र राज करने वाली टीएमसी 294 सदस्यीय विधानसभा में महज 80 सीटों पर सिमट गई है, जबकि बीजेपी ने 208 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है. इस करारी हार के बाद टीएमसी गहरे संकट में है. पार्टी का कैडर बिखर रहा है, नेता इस्तीफे दे रहे हैं और पुलिस स्थानीय बाहुबलियों को पकड़ रही है.
हैरान करने वाली बात ये है कि कोई भी नेता या जनता इस दुर्दशा के लिए पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी को दोष नहीं दे रहा है, बल्कि सारा गुस्सा उनके भतीजे और उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी पर निकल रहा है. कोलकाता के लोगों में अभिषेक बनर्जी को लेकर गुस्सा अचानक नहीं भड़का है.
अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हमला
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कालीघाट स्थित घर बेहद साधारण माना जाता है, लेकिन इसके उलट अभिषेक बनर्जी का घर ‘शांतिनिकेतन’ हमेशा से वैभव और ठाठ-बाठ का प्रतीक रहा है. उनके घर के सामने की आधी सड़क को बैरिकेड्स लगाकर बंद कर दिया जाता था, जिससे आम जनता को भारी परेशानी होती थी. इसके अलावा जब कोलकाता की सड़कों से अभिषेक का बड़ा काफिला गुजरता था, तो पूरे रास्ते बंद कर दिए जाते थे, जिसे लोग टीएमसी के अहंकार और शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखते थे.
हाल ही में जब अभिषेक बनर्जी चुनाव बाद की हिंसा से प्रभावित एक टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने सोनारपुर गए थे, तो उग्र भीड़ ने उन्हें घेर लिया. लोगों ने ‘चोर-चोर’ के नारे लगाए और उन पर अंडे और पत्थर फेंके. टीएमसी ने इसके लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना था कि ये सालों के कुशासन के खिलाफ जनता का स्वाभाविक गुस्सा था.
पुराने बनाम नए नेताओं की जंग
पार्टी में अभिषेक बनर्जी के अचानक बढ़े कद ने ‘ओल्ड गार्ड’ को किनारे कर दिया था. राजनीतिक अनुभव कम होने के बावजूद ममता बनर्जी ने अपने ‘भाइपो’ (भतीजे) को तेजी से आगे बढ़ाया, जिससे वरिष्ठ नेताओं में भारी नाराजगी थी. टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक, 2011 के बाद अभिषेक के उभार के कारण ही मुकुल रॉय जैसे कुशल रणनीतिकार को दरकिनार किया गया, जिन्होंने 2017 में पार्टी छोड़ दी थी.
सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब मौजूदा बीजेपी मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और अभिषेक के बीच मतभेद बढ़े. ममता बनर्जी ने सुवेंदु को हटाकर अभिषेक को युवा विंग का अध्यक्ष बना दिया और शुभेंदु के नियंत्रण वाले जिलों में उनका प्रभाव कम करने की कोशिश की. परेशान होकर शुभेंदु अधिकारी ने नवंबर 2020 में मंत्री पद से और दिसंबर में विधायकी से इस्तीफा दे दिया और बीजेपी में शामिल हो गए. अब हार के बाद पुराने नेता खुलकर बोल रहे हैं.
एक टीएमसी विधायक ने कहा कि अभिषेक के ‘सत्ता के अहंकार’ और ‘घोर भाई-भतीजावाद’ ने पार्टी को बर्बाद कर दिया. वहीं पूर्व विधायक कृष्णेंदु चौधरी ने कहा कि अभिषेक ने पार्टी को धीरे-धीरे नष्ट किया और ममता बनर्जी सब जानते हुए भी ‘धृतराष्ट्र’ की तरह आंखें मूंदे रहीं.
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I-PAC को लाने पर उठे गंभीर सवाल
पार्टी में सबसे ज्यादा गुस्सा राजनीतिक सलाहकार फर्म I-PAC को लेकर है, जिसे अभिषेक बनर्जी ही पार्टी में लेकर आए थे. वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि आई-पैक ने पूरी पार्टी का कॉर्पोरेट अपहरण कर लिया और जमीनी नेताओं को दरकिनार कर दिया.
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, ‘आई-पैक ने टीएमसी संगठन को हाईजैक कर बर्बाद कर दिया. उन्होंने संभावित उम्मीदवारों के बीच आपसी लड़ाई करवाई. जिन नेताओं के टिकट कटे, उन्होंने गुस्से में बीजेपी की मदद की.’
निलंबित प्रवक्ता रीजू दत्ता ने आरोप लगाया कि आई-पैक टिकट के लिए 50 लाख रुपये मांगती थी और विरोध करने वालों के खिलाफ साजिश रचती थी. सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि आई-पैक के लोगों को चुनावी राजनीति का कोई ज्ञान नहीं था, जिससे कार्यकर्ता बेकार बैठ गए. आई-पैक की सलाह पर टीएमसी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे थे, जिनमें से 51 चुनाव हार गए.
डायमंड हार्बर मॉडल और फालता में करारी शिकस्त
अभिषेक बनर्जी का सबसे मजबूत गढ़ ‘डायमंड हार्बर’ लोकसभा क्षेत्र माना जाता था, जहां की फालता विधानसभा सीट पर उनके करीबी जहांगीर खान का दबदबा था. समर्थक इसे ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ कहते थे, लेकिन विरोधियों का आरोप था कि ये मॉडल सिर्फ डराने-धमकाने और पुलिसिया उत्पीड़न पर आधारित था.
2026 के चुनाव में चुनाव आयोग ने फालता के सभी 285 बूथों पर दोबारा मतदान (रिपोल) का आदेश दिया. इसके बाद टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने मैदान छोड़ दिया और बीजेपी के देवांगशु पांडा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की. हालांकि ममता बनर्जी भी भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं, लेकिन फालता में टीएमसी की हार को अभिषेक के गढ़ के ढहने के रूप में देखा जा रहा है.
इस हार के 24 घंटे के भीतर डायमंड हार्बर नगर पालिका के 9 पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया और आरोप लगाया कि इस मॉडल ने सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया.
घोटालों की लंबी सूची, कट-मनी और ‘भाइपो टैक्स’
पश्चिम बंगाल में रोजगार के साधन नहीं बढ़े, लेकिन टीएमसी के राज में ‘कट-मनी’ और ‘सिंडिकेट’ का कारोबार खूब फला-फूला. स्थानीय व्यापारियों को जबरन टीएमसी से जुड़े लोगों से महंगे दामों पर निर्माण सामग्री खरीदनी पड़ती थी. बीजेपी नेताओं ने अभिषेक बनर्जी पर ‘भाइपो टैक्स’ लगाने का आरोप लगाया था, जिसके तहत झारखंड-असम-बंगाल परिवहन कॉरिडोर पर चलने वाले ट्रकों से अवैध वसूली की जाती थी.
अभिषेक बनर्जी का नाम कई बड़े घोटालों में सामने आया
स्कूल भर्ती घोटाला (WBSSC)- केंद्रीय एजेंसियों ने ‘लीप्स एंड बाउंड्स प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनी से जुड़े होने के कारण उनसे कई बार पूछताछ की है. सीबीआई की 2025 की एक चार्जशीट में भी ‘अभिषेक बनर्जी’ नाम के व्यक्ति के अवैध नियुक्तियों के बदले 15 करोड़ रुपये मांगने का जिक्र था.
कोयला तस्करी घोटाला: आसनसोल में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड से 1,300 करोड़ रुपये के अवैध कोयला खनन मामले में ईडी ने अभिषेक और उनकी पत्नी रुजिरा बनर्जी से लंबी पूछताछ की है.
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यही कारण है कि काकोली घोष दस्तीदार और शांतनु सेन जैसे नेताओं ने भ्रष्टाचार के इन आरोपों पर पार्टी का बचाव करने में असमर्थता जताते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है. आज टीएमसी अपने सबसे बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रही है, जहां ममता बनर्जी की छवि अब भी एक जननेता की बनी हुई है, लेकिन अभिषेक बनर्जी को लोग टीएमसी के भीतर फैले भ्रष्टाचार और पतन का अहम चेहरा मान रहे हैं.
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