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अमर विसम्बर ऊपरे, राख नहच्चो राण।।”
इस दोहे का अर्थ है- ‘धर्म और धरती हमेशा बने रहेंगे, लेकिन ये विदेशी आक्रमणकारी (खुरसाण) एक दिन समाप्त हो जाएंगे।’
ये दोहा मुगल सेनापति रहीम खान-ए-खाना (मिर्जा खां) ने मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के लिए लिखा था। कारण था- हल्दीघाटी युद्ध के दौरान प्रताप ने मुगलों की बंदी महिलाओं को सम्मान के साथ वापस भेजा था।
ऊंच-नीच और भेदभाव से परे प्रताप को भील समुदाय के लोग ‘कीका’ कहकर पुकारते थे। प्रताप की योग्यता के कारण ही उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय के फैसले को बदलकर उन्हें राजगद्दी पर बैठाया गया था।
राजा बनने के बाद भी वे अपने साथियों के साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते थे। अपने सहयोगी राजाओं की मदद करने में भी पीछे नहीं थे।
प्रताप के प्रति वफादारी का आलम ये था कि अकबर की लाख कोशिशों के बाद भी मुगल उनके हाथी को भी नहीं झुका पाए थे।
दरअसल, महाराणा प्रताप की आज 486वीं जन्मतिथि है। वहीं, 18 जून को हल्दीघाटी युद्ध के 450 साल पूरे हो रहे हैं। भास्कर ने प्रताप गौरव केंद्र के शोध प्रभारी डॉ. विवेक भटनागर, एमजी कॉलेज के प्रोफेसर डॉ सुदर्शन सिंह राठौड़ और सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के आर्ट्स कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ मनीष श्रीमाली से बात कर उनके जीवन के बारे में जाना।

आज की रिपोर्ट में पढ़िए- प्रताप के जीवन से जुड़े 5 रोचक किस्से
1– भील समुदाय के प्रिय और लाडले ‘कीका’ थे प्रताप
इतिहासकार डॉ. सुदर्शन सिंह राठौड़ ने बताया कि मेवाड़ में राजगद्दी पर बैठने से पहले कुंवर प्रताप को ‘कीका’ के नाम से पुकारा जाता था।
मेवाड़ के पहाड़ी क्षेत्रों की भीली या वागड़ी भाषा में ‘कीका’ शब्द का प्रयोग छोटे लड़के के लिए लाड़-प्यार में किया जाता है, जिसे मेवाड़ी में ‘कूका’ कहते हैं।
यह नाम इस बात का प्रमाण है कि प्रताप ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मेवाड़ के पर्वतीय क्षेत्रों में भील समुदाय के बीच बिताया था। उन्होंने अपने सरल और सहृदय व्यवहार से भीलों का मन जीत लिया था।
उस समय के दौरान प्रताप ने भीलों को संगठित करने का काम भी किया था। यही कारण था कि आगे चलकर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष में भील समुदाय उनका प्रमुख सहायक बना था।
पर्वतीय भागों में भीलों के बीच रहने और वहां की कठिनाइयों का सामना करने से उनके चरित्र में साहस, धैर्य, स्वाभिमान और त्याग जैसे गुणों का विकास हुआ था।
अबुल फजल की ‘अकबरनामा’, बदायुनी की ‘मुंतखब उत तवारीख’ और ‘तबकात ए अकबरी’ जैसे फारसी ग्रंथों के साथ-साथ ‘वीर विनोद’ जैसी प्रमुख पुस्तकों में भी उन्हें ‘राणा कीका’ कहा गया है।
साथियों के साथ ही खाना खाते थे
इतिहासकार डॉ. मनीष श्रीमाली ने बताया कि ‘अमरकाव्य’ ग्रंथ के अनुसार-जब महाराणा प्रताप को चित्तौड़गढ़ के राज-दरबार में प्रवेश से रोक दिया गया था, तब वे किले की तलहटी में स्थित एक गांव में रहते थे।
उस समय किले से उनके लिए खाने-पीने का सामान भेजा जाता था। प्रताप उस भोजन के दोने बनाकर अपने 10 साथियों को देते थे। इसके बाद खुद भी उनके साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते थे।
राजगद्दी पर बैठने के बाद भी उन्होंने इस परंपरा को बनाए रखा, जो आगे चलकर मेवाड़ राजपरिवार का एक स्थायी रिवाज बन गया। प्रताप सुबह और शाम दोनों समय इसका पूरी तरह पालन करते थे।
(कंटेंट सोर्स – अकबरनामा, मुंतख़ब उत तवारीख़, तबकात ए अकबरी, वीर विनोद।)

2– प्रताप के छोटे भाई को उत्तराधिकारी किया था घोषित
इतिहासकार डॉ मनीष श्रीमाली ने बताया- मेवाड़ की राजगद्दी को लेकर जो घटनाक्रम हुआ, वह भुलाया नहीं जा सकता। इसका उल्लेख पुस्तक वीर विनोद और उदयपुर राज्य का इतिहास में हैं, इस घटना को ‘राजमहलों की क्रांति’ कहा गया है।
महाराणा उदयसिंह अपनी भटियाणी रानी धीरकंवर के प्रभाव में थे। इसी कारण उन्होंने परंपरा के खिलाफ जाकर अपने ज्येष्ठ (बड़े) पुत्र प्रताप की जगह छोटे बेटे जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।
विरोध के डर से उन्होंने इसकी सार्वजनिक घोषणा नहीं की थी। 28 फरवरी 1572 को गोगुन्दा में उदयसिंह की मृत्यु हो गई। परंपरा के मुताबिक- नया राजा अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होता था, बल्कि राजगद्दी पर बैठने की तैयारी करता था।
जब उदयसिंह की अंतिम यात्रा में जगमाल नहीं दिखा, तो सामंतों में कानाफूसी होने लगी थी। ग्वालियर के राजा रामशाह के पूछने पर जगमाल के सगे भाई कुंवर सागर ने राज खोला कि उदयसिंह जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित कर गए हैं।
मेवाड़ को बचाने के लिए सामंतों ने प्रताप को गद्दी पर बैठाया था
इतिहासकार डॉ. सुदर्शन सिंह राठौड़ ने बताया कि उस समय मेवाड़ गहरे संकट में था। चित्तौड़गढ़ हाथ से निकल चुका था और अकबर जैसा शक्तिशाली दुश्मन सामने खड़ा था।
ऐसे माहौल में सोनगरा मानसिंह अखैराजोत, रावत कृष्णदास और रावत सांगा जैसे वरिष्ठ सामंतों का मानना था कि केवल एक सुयोग्य शासक ही मेवाड़ की रक्षा कर सकता है।
उन्होंने एकमत होकर निर्णय लिया कि ज्येष्ठ (बड़े) कुंवर प्रताप सिंह ही हर तरह से सुयोग्य और मेवाड़ के असली अधिकारी हैं। दूसरी तरफ, प्रताप गृह-कलह और अपमान से बचने के लिए मेवाड़ छोड़ने की तैयारी कर रहे थे।
तभी रावत कृष्णदास और राजा रामशाह राजमहल पहुंचे, जहां जगमाल सिंहासन पर बैठा था। उन्होंने जगमाल को हाथ पकड़कर गद्दी से नीचे उतारा और कहा कि छोटा भाई होने के नाते उनका स्थान गद्दी के सामने है। इसके बाद उन्होंने प्रताप को सिंहासन पर बैठाया था।

अकबर की शरण में गया था प्रताप का भाई
इतिहासकार मनीष श्रीमाली ने बताया कि इस बदलाव से अपमानित महसूस करते हुए जगमाल मेवाड़ छोड़कर पहले जहाजपुर और फिर मुगल बादशाह अकबर की शरण में चला गया।
अकबर ने उसे जहाज़पुर की जागीर दे दी और बाद में सिरोही का आधा राज्य भी दिलवा दिया। आखिरकार, साल 1583 ई. में दताणी के युद्ध में जगमाल मारा गया और मेवाड़ के लिए उसका खतरा हमेशा के लिए खत्म हो गया।
इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम की प्रामाणिक जानकारी हमें ‘उदयपुर राज्य का इतिहास’ और ‘वीर विनोद’ जैसी प्रमुख पुस्तकों में मिलती है।
इतिहासकार डॉ. विवेक भटनागर ने बताया कि इतिहास में यह घटना इसलिए खास है क्योंकि जहां दूसरे राज्यों में गद्दी के लिए भाई-भाई के बीच खूनी जंग होती थी। वहीं मेवाड़ में यह बदलाव बेहद शांतिपूर्ण तरीके से हुआ।
कटेंट सोर्स – उदयपुर राज्य का इतिहास, वीर विनोद।

प्रताप को राजगद्दी पर बैठाने के लिए सामंतों ने उनके छोटे भाई जगमाल को गद्दी से उतार दिया था।
3 – मुगल भी करने लगे थे प्रताप का सम्मान
इतिहासकार सुदर्शन सिंह राठौड़ ने बताया कि यह घटना हल्दीघाटी युद्ध के बाद के समय की है। साल 1581 ई. के मध्य में रहीम खानखाना को शहजादे सलीम (जहांगीर) का अभिभावक बनाया गया था।
वे अजमेर की सूबेदारी छोड़कर मुगल दरबार चले गए थे। जून 1581 ई. से कुछ समय पहले जब रहीम खानखाना राजस्थान के अभियान पर थे।
तब मुगल सेना को युद्ध में भारी नुकसान हुआ और महिलाएं भाग खड़ी हुई थीं। तब कुंवर अमर सिंह को लूट के माल के साथ खानखाना (मिर्जा खां) के परिवार की असहाय स्त्रियां भी मिलीं, जिन्हें उन्होंने बंदी बना लिया था। जैसे ही इसकी सूचना महाराणा प्रताप को मिली।
उन्होंने इसे अपने क्षत्रिय आदर्शों के सख्त खिलाफ माना। प्रताप ने तुरंत कुंवर अमर सिंह को आदेश दिया कि वे उन सभी महिलाओं को पूर्ण आदर और सम्मान के साथ सुरक्षित रूप से वापस मिर्जा खां के पास पहुंचाकर आएं।
कुंवर अमर सिंह ने महाराणा प्रताप के आदेश का पालन करते हुए मुगल महिलाओं को ससम्मान वापस भेज दिया।
प्रताप की उदारता को दोहे में व्यक्त किया था
इतिकासकार डॉ. विवेक भटनागर ने बताया कि महाराणा प्रताप की इस असाधारण उदारता और नैतिकता से खान-ए-खाना (मिर्जा खां) बेहद प्रभावित हुए।
उनके हृदय में प्रताप के प्रति गहरा स्नेह, आदर और श्रद्धा की भावना पैदा हो गई, जो जीवन भर बनी रही। खान-ए-खाना ने अपनी इस श्रद्धा को इस प्रसिद्ध दोहे में व्यक्त किया।
इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम का प्रामाणिक वर्णन हमें ‘अकबरनामा’, ‘अमर काव्यम्’, ‘उदयपुर राज्य का इतिहास’ और ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ जैसी प्रमुख पुस्तकों में मिलता है।
(कंटेंट सोर्स – अकबरनामा, अमर काव्यम्, उदयपुर राज्य का इतिहास, राजप्रशस्ति महाकाव्य।)

4 – प्रताप का हाथी भी मुगलों के सामने नहीं झुका था
श्रीमाली ने बताया कि बादशाह अकबर को हाथियों में विशेष रुचि थी। उसने महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद की जबरदस्त ताकत, विशाल शरीर और उसके युद्ध-कौशल की ख्याति के बारे में गहराई से सुन रखा था।
इसी वजह से अकबर ने कई बार राणा प्रताप को संदेश भिजवाया था कि वे रामप्रसाद हाथी को मुगल दरबार में भेज दें, लेकिन अपनी आन-बान और शान के लिए मशहूर राणा प्रताप ने अकबर की इस मांग को हर बार ठुकरा दिया।
मुगलों ने प्रताप का हाथी अकबर को दिया था
हल्दीघाटी का युद्ध मुगल हार गए थे, लेकिन उन्होंने प्रताप के हाथी रामप्रसाद के महावत को मार गिराया था। इसके बाद राणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद को ले लिया।
हार के बाद भी अपना अच्छा प्रदर्शन दिखाने के लिए अकबर को इस हाथी को आगरा भेजना तय किया गया। आसफ खां के सुझाव पर इस अहम कार्य की जिम्मेदारी इतिहासकार बदायुनी को दी गई।
मानसिंह ने बदायुनी को रामप्रसाद हाथी और उसकी सुरक्षा के लिए 300 घुड़सवार साथ देकर रवाना किया। बदायुनी ने फतेहपुर सीकरी पहुंचकर बादशाह अकबर को युद्ध की पूरी सूचना दी।
अकबर इस हाथी को पाकर बेहद खुश हुआ और उसने तुरंत इसका नाम बदलकर ‘पीरप्रसाद’ रख दिया।
वफादार हाथी का बलिदान और ऐतिहासिक पुस्तकों में वर्णन
अकबर ने हाथी का नाम बदलकर ‘पीरप्रसाद’ रख दिया था। इसका उल्लेख फारसी ग्रंथों में मिलता है। अकबर के पास आने के बाद भी हाथी ने प्रताप के प्रति अपनी वफादारी को नहीं छोड़ा था।
कहा जाता है कि मुगलों की कैद में जाने के बाद रामप्रसाद ने महाराणा प्रताप के वियोग में अन्न और जल त्याग दिया था। उसने मुगलों का दिया कुछ भी नहीं खाया-पिया।
जिसके कारण कुछ समय बाद ही उसने दम तोड़ दिया। इस पूरे प्रसंग का प्रामाणिक विवरण हमें ‘मुन्तख़ब उत तवारीख’, ‘अकबरनामा’ और ‘वीर विनोद’ जैसी प्रमुख ऐतिहासिक पुस्तकों में मिलता है।

5 – प्रताप सहयोगी राजाओं का उठाते थे भार
श्रीमाली ने बताया कि महाराणा प्रताप के बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि वे धन की कमी के कारण बेहद मुश्किलों भरा जीवन जी रहे थे।
हालांकि, इतिहास के कुछ प्रामाणिक स्रोतों से पता चलता है कि उनकी आर्थिक स्थिति पर्याप्त रूप से काफी अच्छी थी। वहीं, महाराणा जंगलों में घास की रोटी खाते थे, इसे भी मिथक ही माना जाता है। क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है।
ग्वालियर के राजा को नकद रुपए देते थे
कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य का जिक्र किया है।
इसके अनुसार- महाराणा प्रताप ग्वालियर के राजा रामशाह तंवर को सेना और अन्य व्यवस्थाओं के लिए हर दिन 800 रुपए (यानी तत्कालीन समय के हिसाब से 100 पौंड) नकद दे रहे थे। इतनी बड़ी रकम रोज देना उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति को दिखाता है।
प्रसिद्ध इतिहासकार मुंहणोत नैणसी की पुस्तक ‘नैणसी री ख्यात’ से भी यह साफ पता चलता है कि मेवाड़ के जावर क्षेत्र से महाराणा प्रताप को प्रतिदिन 400 से 500 रुपए की बड़ी आय होती थी।
नैणसी के इस दावे की पुष्टि बाद के सालों में महाराणा राजसिंह के समय की एक सरकारी बही (रिकॉर्ड) से भी पूरी तरह होती है।
मुगलों को हीरे-जवाहरात भेंट किए थे
प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक ‘उदयपुर राज्य का इतिहास’ में इस बात का विस्तार से वर्णन किया है कि महाराणा प्रताप के पास पर्याप्त मात्रा में आर्थिक संसाधन मौजूद थे।
वे किसी भी तरह से पैसों की तंगी में नहीं थे। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण आगे चलकर ‘मेवाड़-मुगल संधि’ के दौरान मिलता है, जब महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह प्रथम ने मुगलों को बेहद कीमती हीरे और जवाहरात भेंट स्वरूप दिए थे।
राजपरिवार के पास मौजूद कीमती रत्न सीधे तौर पर यह प्रमाणित करते हैं कि महाराणा प्रताप के काल में मेवाड़ आर्थिक रूप से कमजोर नहीं था।
इस पूरे ऐतिहासिक सच की जानकारी हमें ‘जेम्स टॉड की एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’, ‘मुंहणोत नैणसी की ख्यात’ और ‘उदयपुर राज्य का इतिहास’ जैसी प्रमुख पुस्तकों में मिलती है।
(कंटेंट सोर्स – जेम्स टॉड की एनल्स एंड एंटीक्टीवीज आफ राजस्थान, मुंहणोत नैणसी की ख्यात, उदयपुर राज्य का इतिहास।)

प्रताप ने अपने सहयोगी राजाओं को भी मदद की। इतिहास के अनुसार उनके पास धन की कमी नहीं थी।


गोगुंदा में महाराणा प्रताप की छापामार रणनीति से बेबस होने के बाद मुगल सेनापति अपने सैनिकों के भोजन सामग्री को लेकर काफी परेशान रहे।

महाराणा प्रताप को अपने घोडे चेतक से खास लगाव था। चेतक ने हल्दीघाटी युद्व के बाद बलीच गांव में दम तोड़ा था। इस अंतिम समय प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह भी उनके साथ मौजूद थे।

हल्दीघाटी युद्व के दौरान महाराणा प्रताप ने अपने घोडे चेतक पर बैठकर मुगल सेनापति को ललकारा था।
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