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Wednesday, June 10, 2026
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जम्मू-श्रीनगर वंदे भारत बनी नई लाइफलाइन, पर्यटन और कारोबार को मिली रफ्तार

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जम्मू और श्रीनगर के बीच शुरू हुई वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर वादी में गजब का उत्साह है. ये एडवांस सेमी-हाई स्पीड ट्रेन इस केंद्र शासित प्रदेश की नई लाइफलाइन बन चुकी है. क्या स्थानीय लोग और क्या सैलानी, दोनों के बीच इस ट्रेन का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है. 

ये ट्रेन सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाने का जरिया नहीं है. इसने जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पर्यटन उद्योग में एक नई जान फूंक दी है.

इस समय घाटी में पर्यटन का पीक सीजन है. आलम ये है कि इस रूट पर वंदे भारत की सभी ट्रेनें हाउसफुल चल रही हैं. टिकटों के लिए मारामारी है. इसकी सबसे बड़ी वजह है समय की भारी बचत. पहले जिस सफर में पूरा दिन लग जाता था, वो अब 5 घंटे से भी कम में पूरा हो रहा है. 

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कड़ाके की ठंड में भी नहीं थमती रफ्तार

इस साल 30 अप्रैल को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जम्मू और श्रीनगर के बीच इस प्रीमियम ट्रेन सेवा की शुरुआत की थी. इससे पहले, पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कटरा से श्रीनगर के बीच वंदे भारत को हरी झंडी दिखाई थी, जिसने कश्मीर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से सीधे रेल नेटवर्क के जरिए जोड़ दिया था.

इस ट्रेन की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये कड़ाके की ठंड और शून्य से नीचे के तापमान में भी बिना रुके दौड़ सकती है.

इस ऐतिहासिक सफर का गवाह बनने और जमीनी हकीकत जानने के लिए आज तक की टीम ने खुद जम्मू से श्रीनगर तक की यात्रा की. आजतक के संवाददाता सुनील जी भट्ट ने बेहतरीन और मुकम्मल अनुभव के लिए इस ट्रेन की ‘एग्जीक्यूटिव क्लास’ में टिकट बुक की थी. ट्रेन के चलने का समय दोपहर 1:20 बजे था और इसके पहुंचने का वक्त शाम 6:05 बजे तय किया गया था.

हालांकि, ट्रेन जम्मू तवी स्टेशन से थोड़ी देरी से यानी दोपहर 1:30 बजे खुली. लेकिन रफ्तार की जादूगरी देखिए, ट्रेन अपने तय समय से भी 5 मिनट पहले यानी ठीक शाम 6:00 बजे श्रीनगर पहुंच गई. जम्मू से श्रीनगर का ये सफर मात्र 4 घंटे 30 मिनट में पूरा हो गया. एक दौर में इस रफ्तार की कल्पना करना भी नामुमकिन था.

ट्रेन के साथ सेल्फी लेते यात्री

ट्रेन चलने से बहुत पहले ही यात्री स्टेशन पहुंच चुके थे. जैसे ही चमचमाती वंदे भारत जम्मू स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर आकर रुकी, यात्रियों का उत्साह देखने लायक था. लोग मुस्कुरा रहे थे, तालियां बजा रहे थे. कोई ट्रेन के साथ सेल्फी ले रहा था, तो कोई सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाने में मशगूल था.

दरवाजे खुलते ही यात्री खुशी-खुशी अपनी सीटों की तरफ बढ़े. आरामदायक कुर्सियों पर बैठते ही खिड़की के चौड़े शीशों से बाहर का नजारा दिखने लगा. ट्रेन के चलते ही स्टाफ ने यात्रियों को पानी की बोतलें दीं. जिन लोगों ने खाने का विकल्प चुना था, उन्हें सबसे पहले गरमा-गरम टमाटर का सूप परोसा गया.

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सफर में मिले यात्री, सबने कहा- थैंक यू सरकार

ट्रेन जब अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी, तो हमने यात्रियों से बात करना शुरू किया. यात्रियों के चेहरों पर सुकून था. उन्होंने इस ट्रेन सेवा के लिए सरकार का दिल से आभार जताया. ट्रेन में सफर कर रहे भारतीय सेना के एक जवान ने कहा, ‘ये वाकई एक लाजवाब अनुभव है. इस ट्रेन से समय की बहुत बचत होती है और सफर बेहद आरामदायक है. अब जम्मू से श्रीनगर आने-जाने के लिए वंदे भारत ही मेरी पहली पसंद है.’

वहीं पास की सीट पर बैठे एक यात्री ने कहा, ‘मैं इस बेहतरीन शुरुआत के लिए सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं. ये ट्रेन सर्विस जम्मू-कश्मीर के टूरिज्म को एक नए मुकाम पर ले जाएगी.’

एक सरकारी कर्मचारी, जो जम्मू के रहने वाले हैं और उनकी पोस्टिंग श्रीनगर में है, उन्होंने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘पहले मैं वीकेंड पर घर जाने से पहले दस बार सोचता था. रास्ता इतना लंबा और थकाऊ था कि दो दिन की छुट्टी का पता ही नहीं चलता था. लेकिन अब मैं हर शनिवार-रविवार अपने परिवार के पास जम्मू चला जाता हूं. ये इस ट्रेन की वजह से ही मुमकिन हुआ है.’

इसी बीच साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने कैटरिंग स्टाफ ने यात्रियों को मुख्य भोजन परोसा और बाद में पारंपरिक कश्मीरी ‘कहवा’ चाय का स्वाद चखाया.

वीआईपी सहयात्री और उधमपुर स्टेशन की वीर गाथा

रिपोर्टिंग के दौरान हमारी नजर जम्मू-कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सत शर्मा पर पड़ी, जो इसी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे. आज तक से बात करते हुए सत शर्मा ने कहा, ‘ये ट्रेन सेवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता का नतीजा है. पहले सड़क के रास्ते इस सफर में कभी-कभी 10 से 12 घंटे लग जाते थे. आज हम 4 घंटे में कश्मीर पहुंच रहे हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कश्मीर घाटी को देश के रेल नेटवर्क से जोड़ना मोदी सरकार की पिछले 12 सालों की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है. हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद शुक्रगुजार हैं.’

ट्रेन का पहला स्टॉपेज ‘शहीद कैप्टन तुषार महाजन उधमपुर रेलवे स्टेशन’ था, जहां ट्रेन 2 मिनट के लिए रुकी. यहां से भी बड़ी संख्या में यात्री ट्रेन में सवार हुए. सैन्य दृष्टि से ये स्टेशन बहुत अहम है क्योंकि यहीं पर भारतीय सेना की उत्तरी कमान का मुख्यालय है. साल 2023 में इस स्टेशन का नाम बदलकर शहीद कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा गया था.

उधमपुर के रहने वाले वीर कैप्टन तुषार महाजन ने साल 2016 में दक्षिण कश्मीर के पंपोर में एक आतंकी विरोधी अभियान के दौरान देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था.

कटरा स्टेशन: तीर्थयात्रियों का नया रास्ता

उधमपुर के बाद अगला पड़ाव आया ‘श्री माता वैष्णो देवी कटरा स्टेशन’. धार्मिक महत्व को देखते हुए यहां ट्रेन का 5 मिनट का ठहराव है. कटरा माता वैष्णो देवी यात्रा का बेस कैंप है, जहां हर दिन हजारों श्रद्धालु आते हैं. इन दिनों एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है. माता के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु सीधे कटरा से वंदे भारत पकड़कर कश्मीर घूमने निकल रहे हैं.

कटरा स्टेशन पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीनगर जाने वाली इस ट्रेन में सवार हुए. अपनी सीटों पर बैठ रहे ओडिशा के एक परिवार ने आज तक को बताया, ‘हम ओडिशा से आए हैं. माता वैष्णो देवी के दर्शन बहुत अच्छे से हो गए. अब हम कुछ दिन श्रीनगर में छुट्टियां बिताने जा रहे हैं. इस ट्रेन की वजह से अब वैष्णो देवी से सीधे श्रीनगर जाना बहुत आसान और आरामदायक हो गया है.’

चिनाब ब्रिज: जब खिड़की की तरफ घूम गईं सीटें और गूंजा ‘वंदे मातरम’

इस पूरे रेल सफर का सबसे रोमांचक और मुख्य आकर्षण था रियासी जिले में चिनाब नदी पर बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल. ये पुल भारतीय रेलवे के इंजीनियरों की कला का एक ऐसा अजूबा है, जिसकी नदी के तल से ऊंचाई 359 मीटर है. ये पेरिस के मशहूर एफिल टॉवर से भी ऊंचा है. ये मेहराबदार पुल रिएक्टर स्केल पर 8 की तीव्रता वाले भूकंप और 266 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली तेज हवाओं को भी आसानी से झेल सकता है.

जैसे ही ट्रेन इस पुल के पास पहुंची, यात्रियों का उत्साह सातवें आसमान पर था. कई लोग पूरे सफर में इसी पल का इंतजार कर रहे थे. गर्व से भरे यात्रियों ने अपने फोन निकाल लिए. जैसे ही ट्रेन पुल से गुजरी, लोगों ने अपनी रिवॉल्विंग सीटें खिड़की की तरफ घुमा लीं ताकि इस अद्भुत नजारे को करीब से देख सकें. पूरी ट्रेन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी. यात्रियों ने बड़े जोश के साथ ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए.

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एक सहयात्री ने गर्व से कहा, ‘ये हमारे देश के लिए बहुत बड़ा दिन है कि दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल हमारे भारत में बना है. मैं उन सभी इंजीनियरों और मजदूरों को सलाम करता हूं जिन्होंने इस सपने को सच किया.’ एक यात्री ने कहा, ‘भारतीय रेलवे की ये प्रगति देखकर सीना चौड़ा हो जाता है. ये ट्रेन जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल देगी.’

एक अन्य सैलानी ने बताया कि वो इस ट्रेन में सिर्फ इस आलीशान पुल को देखने और वादियों की खूबसूरती का लुत्फ उठाने के लिए चढ़े हैं।

बनिहाल पार करते ही कश्मीर का दीदार और एक पंडित का दर्द

ट्रेन का आखिरी स्टॉपेज जम्मू क्षेत्र का अंतिम कस्बा ‘बनिहाल’ था. यहां 2 मिनट रुकने के बाद ट्रेन कश्मीर घाटी की सीमा में दाखिल हुई. बनिहाल से निकलते ही अगले 10 मिनट में खिड़की के बाहर का नजारा बदल गया. दक्षिण कश्मीर के खूबसूरत गांव, पारंपरिक मकान और धान के हरे-भरे खेत नजर आने लगे. इस खूबसूरत नजारे को देखकर ट्रेन में बैठे एक कश्मीरी पंडित यात्री की आंखें छलक आईं.

एक निजी कंपनी में काम करने वाले इस यात्री ने भावुक होकर बताया, ‘काम के सिलसिले में मेरा घाटी आना-जाना लगा रहता है. इस ट्रेन ने हमारा सफर बहुत आसान बना दिया है. लेकिन जब भी मैं इस खिड़की से अपनी मातृभूमि को देखता हूं, तो मेरा दिल भर आता है. ये घर, ये खेत मुझे 1990 से पहले के उस सुनहरे दौर की याद दिलाते हैं जब हम अपनी जमीन पर खुशी-खुशी रहते थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘लेकिन 1990 में आतंकवादियों ने हमें बंदूक के दम पर यहां से भागने पर मजबूर कर दिया. मैं तब आठवीं क्लास में पढ़ता था और वो खौफनाक मंजर आज भी याद है. ट्रेन शुरू होना बहुत अच्छी बात है, लेकिन आज भी हालात ऐसे नहीं हैं कि हम कश्मीरी पंडित अपने पुराने गांवों में जाकर दोबारा बस सकें. उम्मीद है सरकार हमारे इस दर्द को समझेगी.’

एक सुरीला सफर, वादियों के नाम

बनिहाल से चलने के करीब एक घंटे बाद ट्रेन ठीक शाम 6:00 बजे अपने अंतिम गंतव्य श्रीनगर स्टेशन पर आकर रुक गई. इस तरह जम्मू से श्रीनगर का ये ऐतिहासिक सफर महज साढ़े चार घंटे में पूरा हो गया. जब हम ट्रेन से नीचे उतरे, तो प्लेटफॉर्म पर हमारी मुलाकात कंधे पर उकुलेले (एक छोटा गिटार जैसा वाद्य यंत्र) टांगे एक नौजवान से हुई. 

बातचीत में उसने बताया कि वो भी एक कश्मीरी पंडित है और उसका जन्म 1999 में पलायन के 9 साल बाद हुआ था. वह जिंदगी में पहली बार कश्मीर की जमीन पर पैर रख रहा था. उसने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मैंने अपने माता-पिता और बुजुर्गों से कश्मीर की सुंदरता और अपनी जड़ों के बारे में बहुत सुना है. आज मैं इसे खुद महसूस करने आया हूं. ये हमारी अपनी धरती है. उम्मीद है कि आने वाले समय में सब कुछ बहुत अच्छा हो जाएगा.’

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इसके बाद उसने उकुलेले बजाते हुए कुछ हिंदी और कश्मीरी गाने गाए. इस तरह, रफ्तार और उम्मीदों से भरा ये सफर संगीत की बेहद खूबसूरत और सुरीली धुनों के साथ पूरा हुआ.

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