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Monday, August 3, 2026
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प्रशांत किशोर जीतें या हारें, 3 बड़े बदलाव तय!:क्या सम्राट चौधरी की कुर्सी हिलेगी, तेजस्वी-निशांत की राजनीति बिगड़ेगी?, जानिए 3 पॉइंट में

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जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर अपना पहला चुनाव भाजपा के गढ़ बांकीपुर में जीतेंगे या हारेंगे, इसका फैसला आज दोपहर तक हो जाएगा।

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प्रशांत जीते, बुरी तरह हारे या कड़ी टक्कर देकर हारे तो आगे क्या होगा…समझेंगे; बूझे की नाही में…।

प्रशांत जीते तो पूरी तरह बदल जाएगी बिहार की राजनीति

1. ‘जातिवादी मॉडल’ का अंत और ‘गवर्नेंस’ पर तेज होगी चर्चा

बिहार की राजनीति दशकों से जाति आधारित समीकरणों (यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुस्लिम, EBC, दलित आदि) पर टिकी है। प्रशांत किशोर लगातार जाति से ऊपर और ‘विकास-गवर्नेंस’ की बात करते रहे हैं।

  • बांकीपुर जैसी शहरी सीट पर अगर वे जीत जाते हैं, तो यह मैसेज जाएगा कि कम से कम कुछ वोटर अब सिर्फ जाति नहीं, बल्कि उम्मीदवार की छवि, मुद्दे (रोजगार, प्रवास, शिक्षा, प्रशासन) और नया विकल्प देखकर वोट दे रहे हैं।
  • हालांकि, सिर्फ इस जीत से जातिवादी राजनीति का अंत नहीं होगा। लेकिन राज्यभर में चर्चा जरूर तेज होगी। मीडिया, बुद्धिजीवी और युवा वर्ग में गवर्नेंस, पारदर्शिता, नौकरशाही सुधार और मेरिट पर ज्यादा बात होगी।
  • अन्य दल भी मजबूर होंगे कि वे सिर्फ जाति समीकरण न गिनाएं, बल्कि ठोस वादे और ट्रैक रिकॉर्ड दिखाएं। प्रशांत विधानसभा में अकेले विधायक के रूप में भी गवर्नेंस संबंधी मुद्दे उठाकर दबाव बनाए रख सकते हैं।

2. भाजपा कमजोर होगी, JDU-RJD का संभलना मुश्किल

बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक किला रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का परिवार 1995 से यहां से जीतता रहा है।

प्रशांत किशोर चुनाव प्रचार के दौरान खुद कह चुके हैं- ‘यहां हमारी जीत तब ही होगी, जब दशकों से भाजपा को वोट दे रहा एक बड़ा तबका हमारी तरफ शिफ्ट होगा।’

इसका मतलब कि अगर यहां भाजपा हारी तो साफ है कि उसका शहरी, मिडिल क्लास और अपर कास्ट का मजबूत आधार हिल गया है।

विकल्प नहीं होने और लालू राज के लौटने के डर से भाजपा को वोट दे रहे लोगों को राज्यभर में विकल्प मिल जाएगा। इसका सीधा असर भाजपा के कोर वोटरों पर पड़ेगा।

भाजपा का अभी भी सबसे मजबूत आधार वोट बैंक जनरल कास्ट है, जो कांग्रेस से खिसक कर उसके पास पहुंचा है। अगर यह वोट बैंक भाजपा से खिसका तो बिहार में उसकी स्थिति कांग्रेस वाली हो सकती है।

प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं- ‘यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, सम्राट चौधरी के खिलाफ भी जनमत टेस्ट है। क्योंकि नीतीश कुमार के नाम पर वोट लेकर भाजपा ने अपना आदमी सेट किया है। यहां अगर भाजपा हारी तो इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी।’

2 अगस्त को प्रशांत किशोर ने भी दोहराया- ‘चुनाव सम्राट चौधरी के नाम पर जनमत संग्रह है। अगर भाजपा हारती है तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को लेनी होगी। उनको इस्तीफा देना चाहिए। अगर नहीं देंगे इस्तीफा दो भाजपा अपने ले लेगी।’

मने अगर प्रशांत किशोर चुनाव जीते तो वह सीधे तौर पर राज्यभर में लोगों के बीच जाकर यह बात दोहराएंगे और कहेंगे कि सम्राट चौधरी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। इससे भाजपा के अंदरखाने शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा।

वोटिंग से पहले 29 जुलाई की आधी रात को प्रशांत किशोर जक्कनपुर थाने में पहुंच गए। उनके समर्थकों को कथित तौर पर थाने में रखे जाने का आरोप था। SHO से खूब कहासुनी हुई।

वोटिंग से पहले 29 जुलाई की आधी रात को प्रशांत किशोर जक्कनपुर थाने में पहुंच गए। उनके समर्थकों को कथित तौर पर थाने में रखे जाने का आरोप था। SHO से खूब कहासुनी हुई।

  • JDU: नीतीश कुमार अब पहले वाली स्थिति में नहीं है। JDU पहले से ही सत्ता के लिए गठबंधन पर निर्भर है। अगर भाजपा कमजोर होगी तो इसका असर JDU पर भी पड़ेगा। पार्टी का एक धड़ा RJD से ज्यादा BJP के साथ कंफर्टेबल रहता है। प्रशांत के उभार से JDU के कुछ असंतुष्ट नेता आकर्षित हो सकते हैं। पार्टी के अंदर भगदड़ मच सकती है। यह निशांत कुमार के लिए चुनौती भरा होगा।
  • RJD: प्रशांत किशोर की इस जीत से तेजस्वी यादव की पार्टी को भी चुनौती मिलेगी। युवा और सत्ता परिवर्तन के इच्छुक वोटर, जो कभी RJD की ओर झुकते थे, अब जन सुराज की ओर देख सकते हैं। RJD को सबसे बड़ा झटका मुस्लिम वोटरों को लेकर लग सकता है। यह समाज BJP को रोकने के लिए प्रशांत किशोर की तरफ शिफ्ट हो सकता है।
  • बांकीपुर में ऐसा दिखा भी है। अगर ऐसा होगा तो तेजस्वी का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण बिखर जाएगा और पार्टी बेहद कमजोर हो जाएगी। राज्य में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी 17.7% है।

कुल मिलाकर तीनों पार्टियों भाजपा, JDU और RJD को अपनी रणनीति बदलनी होगी। नए सिरे से समीकरण बनाने होंगे।

3. गठबंधन का स्वरूप बदलेगा

बीते 35 सालों में बिहार में कोई पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। उसे सत्ता की कुर्सी पाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करना ही पड़ा है। फिलहाल राज्य में दो गठबंधन है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन।

NDA में 5 पार्टियां हैं-BJP, JDU, LJP(R), HAM, RLM।

महागठबंधन में 7 पार्टियां हैं-RJD, कांग्रेस, माले, CPI, CPI(M), IIP, VIP।

  • अगर प्रशांत किशोर बांकीपुर में जीतते हैं तो दोनों गठबंधनों के अंदरूनी समीकरणों पर असर पड़ सकता है। महागठबंधन में तो इसकी शुरुआत भी हो गई है। कांग्रेस और RJD एक-दूसरे पर हमलावर है।
  • कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा- ‘बिहार में महागठबंधन को ठीक से चलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी RJD के कंधों पर है, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में तेजस्वी यादव ने बाकी साथी दलों को साथ लेने की जरूरत ही नहीं समझी।
  • आखिर तेजस्वी ने इस चुनाव में सहयोगियों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? तेजस्वी यादव गठबंधन को लेकर बिल्कुल भी ईमानदार नहीं हैं। वह अपना खुद का राजनीतिक समीकरण बचाने में भी नाकाम रहे हैं।
  • कांग्रेस के इस बयान पर RJD ने पलटवार किया है। RJD प्रवक्ता एजाज अहमद ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
  • प्रशांत की जीत से तीसरी ताकत की संभावना मजबूत होगी। NDA के अंदर के दलों का नजरिया भी अगले चुनाव तक बदल सकता है।

4. वोट-कटवा से आगे बढ़कर ‘गेम-चेंजर’ की छवि

2025 बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को वोट-कटवा कहा गया। पार्टी 238 सीटों पर लड़ी, एक भी नहीं जीत पाई। 237 सीटों पर तो जमानत जब्त हो गई।

  • बांकीपुर में जीत इस छवि को पूरी तरह बदल देगी। प्रशांत किशोर अब सिर्फ रणनीतिकार या आलोचक नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में जीत हासिल करने वाले नेता बन जाएंगे। उनकी पार्टी को गंभीरता से लिया जाएगा। फंडिंग, संगठन और नए चेहरे आकर्षित करने में आसानी होगी।
  • मीडिया और जनता में वे गेम-चेंजर के रूप में स्थापित हो जाएंगे, जो स्थापित दलों को चुनौती दे सकते हैं।
  • इससे उनका राजनीतिक वजन बढ़ेगा। भविष्य में वे किसी भी गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं या स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकते हैं।

हालांकि, एक सीट की जीत से गेम-चेंजर बनना आसान है, लेकिन उसे बनाए रखना मुश्किल। अगर अगले चुनावों में प्रदर्शन नहीं दिखाया तो यह छवि फिर से फीकी पड़ सकती है।

चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने बांकीपुर की हर गली में दस्तक दी थी। 30 जुलाई को वोटिंग हुई।

चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने बांकीपुर की हर गली में दस्तक दी थी। 30 जुलाई को वोटिंग हुई।

PK कड़ी टक्कर देकर हारे तो 2 चीजें होनी तय

1. भाजपा का मनोबल टूटेगा

अगर प्रशांत किशोर कड़ी टक्कर देकर हारते हैं (यानी भाजपा की जीत मुश्किल से होती है या वोट शेयर में भारी गिरावट आती है), तो पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह मनोबल प्रभावित होगा।

  • कार्यकर्ता और स्थानीय नेता खुद से सवाल पूछेंगे कि इतने मजबूत गढ़ में भी इतनी मुश्किल क्यों हुई। उम्मीदवार चयन, संगठन की सक्रियता और शहरी वोटरों तक पहुंच पर सवाल उठेंगे। सम्राट चौधरी सरकार की लोकप्रियता पर भी चर्चा शुरू हो जाएगी।
  • विपक्षी दल इसे भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश करेंगे। इससे आगामी स्थानीय चुनावों या उपचुनावों में भाजपा को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ेगी।

हालांकि, मनोबल पूरी तरह नहीं टूटेगा क्योंकि जीत तो हासिल हो जाएगी। लेकिन आसान जीत की धारणा खत्म हो जाएगी। जैसे- बांकीपुर को लेकर कहा था- कुत्ता, बिल्ली को भी टिकट देंगे तो जनता जीता देगी। इस तरह का आत्मविश्वास टूट जाएगा।

2. RJD-कांग्रेस को फौरी राहत, लेकिन टेंशन बढ़ेगी

अगर प्रशांत किशोर हार जाते हैं तो महागठबंधन को तत्काल राहत मिलेगी कि तीसरी ताकत अभी पूरी तरह नहीं उभरी है। लेकिन कड़ी टक्कर का मतलब यह भी होगा कि उनका अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है।

  • प्रशांत किशोर की हार से RJD-कांग्रेस को यह कहने का मौका मिलेगा कि जनता अभी भी मुख्य रूप से दो ध्रुवों (NDA बनाम महागठबंधन) में बंटी हुई है। तेजस्वी यादव जैसे नेता इसे अपनी उपस्थिति का सबूत बता सकते हैं।
  • अगर PK ने अच्छा वोट शेयर हासिल किया खासकर युवा, शहरी या असंतुष्ट वोटरों से तो RJD की चिंता बढ़ जाएगी कि बदलवा लाने वाले वोटर उसके पास से खिसक रहे हैं।
  • कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ेगा कि वह अपनी प्रासंगिकता बनाए रखे। लंबे समय में महागठबंधन को तय करना होगा कि जन सुराज से दूरी बनाए रखें या किसी तरह का तालमेल तलाशें।

हालांकि, यह राहत अस्थायी होगी। PK की मौजूदगी उन्हें लगातार सतर्क रखेगी और अपने एजेंडे रोजगार, पलायन, युवाओं के मुद्दे को और तेज करने के लिए मजबूर करेगी।

प्रशांत किशोर अगर बुरी तरह हारे तब…

1. पुराने ढर्रे की राजनीति जारी रहेगी

बिहार की राजनीति लंबे समय से जाति-आधारित समीकरण, परिवारवाद, गठबंधन की जुगत और स्थापित दलों BJP-JDU बनाम RJD-कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। PK लगातार नया मॉडल (गवर्नेंस, मेरिट, जाति से ऊपर) की बात करते रहे हैं।

  • अगर वे बांकीपुर जैसी शहरी और अपेक्षाकृत शिक्षित सीट पर भी बुरी तरह हार जाते हैं तो संदेश साफ जाएगा कि मतदाता अभी भी पुराने ढर्रे को ही प्राथमिकता देते हैं। जाति, स्थानीय प्रभाव और पारंपरिक पार्टी मशीनरी की ताकत फिर से साबित होगी।
  • खासकर भाजपा इसे अपनी रणनीति की सफलता बताएंगी। अन्य दल भी जाति और गठबंधन की पुरानी चालों पर और ज्यादा निर्भर रहेंगे।
  • बदलाव की चर्चा कुछ समय के लिए कमजोर पड़ जाएगी। राजनीति फिर से द्विध्रुवीय (NDA बनाम महागठबंधन) ढांचे में स्थिर हो जाएगी। नए प्रयोगों को लेकर संदेह बढ़ेगा।
नामांकन से पहले प्रशांत किशोर ने परिवार के साथ 13 जुलाई को मंदिर में जाकर पूजा की थी। 14 जुलाई को उन्होंने बांकीपुर विधानसभा सीट से नामांकन किया था। 34.30% वोटिंग हुई है।

नामांकन से पहले प्रशांत किशोर ने परिवार के साथ 13 जुलाई को मंदिर में जाकर पूजा की थी। 14 जुलाई को उन्होंने बांकीपुर विधानसभा सीट से नामांकन किया था। 34.30% वोटिंग हुई है।

2. नए विकल्प तलाशने वालों को झटका

2025 के चुनाव और उसके बाद प्रशांत किशोर की यात्राओं ने कई युवा, शहरी, मिडिल क्लास और नाराज वोटरों में तीसरा विकल्प की उम्मीद जगाई थी। बांकीपुर में खुद मैदान में उतरकर उन्होंने इस उम्मीद को और मजबूत किया था।

  • बुरी हार से इन वोटरों को निराशा होगी। वे महसूस करेंगे कि नया विकल्प अभी व्यवहारिक नहीं है या सिस्टम इतना मजबूत है कि उसे आसानी से नहीं बदला जा सकता।
  • कई लोग फिर से पुराने दलों की ओर लौट सकते हैं या राजनीति से उदासीन हो सकते हैं। परिवर्तन की बात करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी सवाल उठेंगे।
  • लंबे समय में यह नए प्रयोगों के प्रति जनता के उत्साह को कम कर सकता है। जब तक कोई और मजबूत विकल्प नहीं उभरता, लोग पुराने विकल्पों में से ही चुनने को मजबूर रहेंगे।

3. जन सुराज कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा

जन सुराज अभी नई पार्टी है। 2025 में शून्य सीट के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले से ही चुनौती में था। प्रशांत किशोर की खुद की उम्मीदवारी ने उन्हें नई ऊर्जा दी थी।

  • बुरी हार से कार्यकर्ताओं में निराशा फैल सकती है। कई लोग पार्टी छोड़कर अन्य दलों में जा सकते हैं। संगठन कमजोर पड़ सकता है, फंडिंग प्रभावित हो सकती है और सक्रियता घट सकती है।
  • प्रशांत किशोर को खुद भी अपनी रणनीति पर सवाल का सामना करना पड़ सकता है। पार्टी को फिर से संगठित करने में ज्यादा समय और मेहनत लगेगी।

हालांकि, अगर प्रशांत किशोर सक्रिय रहें और मुद्दों पर दबाव बनाए रखें तो कुछ समर्पित कार्यकर्ता टिके रह सकते हैं। लेकिन व्यापक मनोबल टूटना लगभग तय है।

एक्सपर्ट पैनलः पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह, प्रियदर्शी रंजन, केके लाल, सत्यभूषण सिंह।

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