पटना के बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत BJP के लिए ज्यादा खतरे की घंटी है या तेजस्वी यादव के लिए। जवाब है-दोनों के लिए। लेकिन सबसे ज्यादा खतरा तेजस्वी यादव को है।
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ऐसा क्यों, समझेंगे; बूझे की नाही में…।
तेजस्वी यादव के लिए प्रशांत किशोर बड़ा खतरा क्यों…
1. ‘पार्ट टाइम पॉलिटिशियन’ की इमेज बनी रही तो बढ़ेगी मुश्किल
RJD नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की इमेज पार्ट टाइम पॉलिटिशिन की बनती जा रही है। BJP-JDU नेता उन्हें नान सीरियस पॉलिटिशिन कहते हैं। तेजस्वी यादव की ऐसी इमेज क्यों बन रही है, इसे बीते 9 महीने में हुई इन 7 घटनाओं से समझिए…
- 3 अगस्त को बांकीपुर उपचुनाव के वोटों की गिनती हो रही थी। इसी बीच तेजस्वी यादव सोनपुर के बाबा हरिहरनाथ मंदिर सावन की पहली सोमवारी पर पूजा करने पहुंचे। पत्रकारों ने उपचुनाव पर सवाल पूछा। उन्होंने कहा, ‘चुनाव आते जाते रहता है। इस पर क्या टीका-टिप्पणी करना।’
- बांकीपुर उपचुनाव के लिए तारीखों की घोषणा 2 जुलाई को चुनाव आयोग ने की। इसी दिन तेजस्वी यादव परिवार के साथ विदेश टूर पर निकल गए। सीधे 26 जुलाई को पटना पहुंचे। चुनाव प्रचार के आखिरी दो दिनों 27 और 28 जुलाई को सभा की और एक रोड शो किया।
- तेजस्वी यादव जब विदेश में परिवार के साथ घूम रहे थे तब बिहार विधानसभा का मानसून सत्र 20 से 24 जुलाई तक चला। इस सत्र में तेजस्वी यादव ने एक दिन भी हिस्सा नहीं लिया।
- दिल्ली में जंतर-मंतर पर छात्रों ने NEET पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन किया। 20 जुलाई को कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सपा नेता अखिलेश यादव सड़क पर उतरे। तेजस्वी यादव पूरे सीन से गायब रहे। वह और उनकी पार्टी पूरे आंदोलन में कहीं नहीं दिखी। सिवाय X पर पोस्ट करने के।
- 16 मार्च को बिहार की राज्यसभा की 5 सीटों के लिए वोटिंग हुई। इसमें तेजस्वी यादव की पार्टी RJD के कैंडिडेट अमरेंद्र धारी सिंह हार गए। रिजल्ट की घोषणा के कुछ मिनट बाद ही तेजस्वी कोलकाता रवाना हो गए। वह उस समय पटना से रवाना हुए, जब उनकी पार्टी के 1 और कांग्रेस के 3 विधायकों ने बगावत कर दी थी।
- 2025 विधानसभा चुनाव का रिजल्ट 14 नवंबर को आया। RJD 25 सीटें ही जीत पाई। इतनी करारी हार के बाद तेजस्वी सीन से गायब हो गए। सिर्फ एक दिन समीक्षा बैठक की, उसी में उनको RJD विधायक दल का नेता चुन लिया गया।
- 1 दिसंबर 2025 को विधानसभा का सत्र शुरू हुआ तो शपथ लेने सदन गए। उसके बाद पूरे सत्र से गायब रहे। राज्यपाल के अभिभाषण तक में नहीं गए। 2 दिसंबर की शाम फैमिली के साथ यूरोप टूर पर निकल गए। क्रिसमस और न्यू ईयर मनाकर एक महीने बाद पटना पहुंचे।
तेजस्वी यादव पर उनकी बहन रोहिणी आचार्य ने भी बिना नाम लिए तंज कसा है और उनकी राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाया है।
3 अगस्त को रोहिणी ने X पर लिखा, ‘बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से फिर साबित हो गया कि जीत उसकी जरूर होती है, जो लगातार लड़ता है, जनता से जिसका निरंतर जुड़ाव होता है, जो कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों का सम्मान करता है और उनके साथ संपर्क व संवाद कायम रखता है।’
- पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर लगातार 4 साल से गांव-गांव घूम रहे हैं। नवंबर 2025 में बुरी तरह हारने के बाद भी वह लगातार जिला-जिला बैठक करते दिखे। उन्होंने एक लड़ाकू और मेहनती नेता की छवि बनाई है। वहीं, तेजस्वी यादव गायब रहते हैं। तेजस्वी को जब सड़क और सदन में होना चाहिए, तब वह विदेश में रहते हैं।’
- प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘बिहार में सफल वही हो सकता है, जो पार्ट टाइम नहीं, 24X7 पॉलिटिक्स करे। प्रशांत किशोर की अब विधानसभा में एंट्री हो गई है। उनके अंदर छोटे से छोटे मुद्दों को बड़ा बनाने की क्षमता है। ज्यादा संभव है कि वह अकेले दम विपक्ष का चेहरा बन सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो तेजस्वी की राह मुश्किल हो जाएगी।’

बांकीपुर उपचुनाव के प्रचार के आखिरी 36 घंटों में तेजस्वी यादव ने जनसभा और रोड शो की।
2. 36% जेन-Z वोटर, उनको जाति नहीं, समस्या का समाधान चाहिए
बिहार देश का सबसे युवा राज्य है। नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में राज्य की 23.05% आबादी 18-29 साल की उम्र के लोगों की है। वहीं, 7.42 करोड़ वोटरों में से 36.72% वोटर 18-29 साल के बीच के हैं। मतलब 2.72 करोड़ वोटर जेन-Z हैं।
- बांकीपुर उपचुनाव में ग्राउंड पर साफ तौर पर दिखा कि जेन-Z वोटरों के लिए जातीय समीकरण कोई मायने नहीं रखता। वह किसी भी जाति, धर्म या समाज के हो, मुद्दे की बात करते दिखे। शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास, रोजगार पर सवाल करते दिखे।
- सीनियर जर्नलिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर बदलाव की बात कर रहे हैं, जबकि तेजस्वी यादव उसी पुराने जातीय समीकरण के सहारे राजनीति कर रहे हैं। दोनों के अप्रोच में भारी गैप है।’
- अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘ जेन-Z को नई राजनीति चाहिए। उनकी नजर में तेजस्वी से ज्यादा प्रशांत किशोर फिट हैं। वह पढ़े लिखे हैं, उनके पास बाहर काम करने का भी अनुभव है और किसी छोटे मुद्दे को बड़ा करने की क्षमता भी।’

लेखक चेतन भगत कहते हैं, ‘राजनेताओं को जेन-जी के प्रति कोरे दिखावे और खोखले सिम्बॉलिज्म से सावधान रहना चाहिए। महज युवाओं जैसे कपड़े पहनने, स्लैंग बोलने और ‘मुझे युवा लोग पसंद हैं’ कहने भर से उनका दिल नहीं जीता जा सकता है। वास्तव में जो चीज काम आएगी, वह है वास्तविकता। सच्ची वास्तविकता, जिसमें आप अपनी ताकत के साथ अपनी सीमाओं और खामियों को भी बताने को तैयार हों।’
3. मुस्लिम वोटरों में भरोसा पैदा नहीं किया तो छोड़ सकते हैं साथ
तेजस्वी यादव के सामने अभी सबसे ज्यादा चिंता अपने मुस्लिम वोटरों को सहेजकर रखने की है। बिहार में मुस्लिम वोटर पारंपरिक रूप से RJD (M-Y समीकरण) का मुख्य आधार रहे हैं। हालांकि, लंबे समय से यह शिकायत रही है कि वोट के अनुपात में उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और आर्थिक विकास में उचित हिस्सेदारी नहीं मिली।
प्रशांत किशोर ने अपनी पदयात्रा के दौरान आबादी के अनुपात में टिकट देने का वादा किया था। मुस्लिम समाज के अंदरखाने मंथन जारी है। चूंकि मुस्लिम समाज लालू फैमिली के साथ तब तक ही जुड़ा है, जब तक उसे कोई भाजपा को हराने वाला मजबूत दावेदार नहीं मिल जाता।
अगर मुस्लिम समाज को लगेगा कि तेजस्वी भाजपा को नहीं रोक सकते, तो वह तुरंत साथ छोड़ देगा। बांकीपुर उपचुनाव का रिजल्ट इसका उदाहरण है।
- बांकीपुर में मुस्लिम समाज को लगा कि प्रशांत किशोर भाजपा को हरा देंगे तो वह उधर शिफ्ट हो गया। इससे RJD की जमानत जब्त हो गई।
- इससे पहले नवंबर 2025 विधानसभा चुनाव में सीमांचल में जहां मुस्लिम समाज अपने दम पर कैंडिडेट जिताने की क्षमता रखता था वहां उसने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को जीता दिया।
- पॉलिटिकल एनालिस्टों की मानें तो अगर अगले चुनाव तक तेजस्वी के बारे में मुस्लिम समाज में परसेप्शन बन गया कि वह भाजपा को नहीं रोक सकते तो वह प्रशांत किशोर की तरफ खिसक सकते हैं। इससे लालू परिवार का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण बिखर जाएगा।
4. सड़क पर नहीं किया संघर्ष तो बिखर सकते हैं यादव
बिहार में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बना दिया है। अब नीतीश कुमार का दौर खत्म हो गया है। ऐसी सूरत में सत्ता की एक खिड़की बंद हो गई। लालू फैमिली के साथ अभी भी यादव समाज एकजुटता से जुड़ा है। इसमें कोई इफ-बट नहीं है।
- हालांकि, क्षेत्रीय दलों में वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए ‘सत्ता’ एक बड़े फेविकोल का काम करती है। सत्ता में न होने पर स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक पहुंच, पुलिस-कचहरी के मामलों में मदद और ठेके-पट्टे जैसी आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
- ऐसी स्थिति में बिना सत्ता में रहे यादव समाज लंबे समय तक लालू फैमिली के पीछे ही खड़ा रहेगा, कहना मुश्किल है।
- बांकीपुर के कुछ इलाकों में यादव वोटर RJD से नाराज दिखे। वह अपने नेता तेजस्वी यादव के इस तरह बैकफुट पर रहने से चिंतित दिखे। वह नहीं चाहते कि उनका नेता सड़क पर संघर्ष करता नहीं दिखे। यही कारण है कि कुछ इलाकों में यादव समाज ने प्रशांत किशोर को वोट कर दिया। आगे ऐसा नहीं होगा, यह नहीं कहा जा सकता।

BJP के लिए PK खतरा, लेकिन तेजस्वी से कम क्यों
1. BJP कोर्स करेक्शन करने में माहिर
BJP अपनी रणनीति में बदलाव करने में माहिर है। वह हार से तुरंत सबक लेकर अपनी नीतियों में बदलाव करती है। साथ ही टफ डिसीजन लेने के लिए जानी जाती है।
चुनावों के रिजल्ट के बाद किसी भी असंतोष या नए खिलाड़ी के उभार का संकेत मिलते ही शीर्ष नेतृत्व और RSS कैडर जमीनी स्तर पर फीडबैक लेकर अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव करता है।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट सत्यभूषण सिंह बताते हैं, ‘2022 में बोचहां उपचुनाव में भी भाजपा भूमिहार वोटरों की नाराजगी के कारण बुरी तरह हार गई। इस चुनाव के रिजल्ट के तुरंत बाद भाजपा ने स्थानीय भूमिहार नेताओं को मैनेज किया। अगले चुनाव में शानदार जीत दर्ज की। यहां तक कि पार्टी ने अपने कोर वोटरों को साधने के लिए मंत्री रहे रामसूरत राय का टिकट तक काट दिया।’
- सत्यभूषण सिंह कहते हैं, ‘भाजपा प्रशांत किशोर की जीत पर चुप नहीं बैठेगी। पार्टी उसकी समीक्षा करेगी और अपनी नीतियों में बदलाव करेगी। तेजस्वी यादव के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। वह चुनाव में हार के बाद भी ना ठीक से समीक्षा करते हैं और ना बैठक।’
2. कोर वोटरों का PK की तरफ झुकाव तात्कालिक है, स्थायी नहीं
फील्ड से मिल रही जानकारी के मुताबिक, बांकीपुर में भाजपा के कोर वोटरों की नाराजगी तात्कालिक है। स्थायी नहीं। पार्टी उसे स्थायी नहीं बनने देगी। अगले कुछ महीनों में सरकार के फैसलों और पार्टी के निर्णयों में इसका असर दिखेगा।
- नाम नहीं छापने की शर्त पर एक भाजपा नेता ने कहा, ‘पार्टी के खराब कैंडिडेट सिलेक्शन, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, मनमाने फैसले के कारण कोर वोटर भाजपा से दूर हुआ। नेताओं के अंदर अहंकार आ गया था। इसका नतीजा है यह चुनावी रिजल्ट।
- उन्होंने आगे कहा, ‘भाजपा का कोर वोटर केवल विकास के नाम पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता (हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा, केंद्र में मजबूत नेतृत्व) के आधार पर जुड़ा है। प्रशांत किशोर का जन सुराज अभी तक कोई स्पष्ट वैचारिक ढांचा पेश नहीं कर पाया है, जिससे कमिटेड वोटर स्थायी रूप से उनकी तरफ शिफ्ट हो जाएगा।’
- केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, ‘हमारी कुछ गलतियां रही होंगी, जिसकी सजा जनता ने दी है। हम सुधार करेंगे। लेकिन विपक्ष इतना खुश ना हो। 2009 में 17 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुआ, जिसमें NDA 12 सीटों पर हार गया। इस पर विपक्ष बहुत खुश हुआ था। फिर 2010 में जनता ने NDA को 202 सीटें दे दी थीं।’

3. BJP के पास पर्याप्त संसाधन, मजबूत सामाजिक आधार
भाजपा राज्य से लेकर केंद्र तक सरकार में है। उसके पास लोगों को मैनेज करने के लिए पर्याप्त संसाधन है। साथ ही राज्य में भाजपा का कैडर और गठबंधन केवल सवर्णों तक सीमित नहीं है, बल्कि गैर-यादव OBC, अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलितों के बीच एक मजबूत और बहुस्तरीय सामाजिक आधार है।
PK का सामाजिक आधार अभी शुरुआती चरण में है और वे इस स्थापित समीकरण में बड़ा डेंट नहीं लगा पाए हैं। भाजपा के पास ‘पन्ना प्रमुख’ और ‘बूथ स्तर’ तक का एक अनुशासित और ट्रेन कैडर है, जो चुनाव के दिन वोटर को बूथ तक लाने की क्षमता रखता है।
सिर्फ एक उपचुनाव से भाजपा के कोर वोटर और सामाजिक समीकरण के बिखरने की भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी।
…तो क्या BJP को PK से डरने की जरूरत नहीं है
ऐसा बिल्कुल नहीं है। अगर BJP ने 3 काम नहीं किए तो प्रशांत किशोर उसे बड़ा नुकसान कर सकते हैं।
1. नीतीश कुमार की पार्टी JDU को बचाए रखना होगा
बिहार में नीतीश कुमार के पास अभी भी 16% से ज्यादा वोट शेयर है। नीतीश कुमार के पास कुर्मी, EBC और न्यूट्रल वोटरों का एक बंच है। जिसके सहारे वह दो ध्रुवों BJP और RJD के बीच संतुलन का काम करते थे।
अब नीतीश कुमार स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। पार्टी धीरे-धीरे उनके बेटे निशांत कुमार के हाथों में शिफ्ट हो रही है। निशांत को लेकर लोगों में संशय की स्थिति है।
ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार की पार्टी को हर हाल में भाजपा को बचाकर रखना होगा। अगर JDU का वोट शेयर डबल डिजिट यानी 10% से ऊपर रहा तो भाजपा की स्थिति मजबूत रहेगी।
2. पारंपारिक वोट बैंक के साथ-साथ न्यूट्रल वोटर्स को साधना
भाजपा के कोर वोटर (सवर्ण, वैश्य समाज) उसे एक मजबूत आधार तो देते हैं, लेकिन सिर्फ कोर वोट बैंक के दम पर बिहार जैसे बड़े राज्य में बहुमत हासिल करना कठिन है।
- प्रशांत किशोर का मुख्य जोर इसी न्यूट्रल/फ्लोटिंग वोटर (जैसे शहरी युवा, मिडिल क्लास और विकास की चाह रखने वाले लोग) पर है। PK अपनी बैठकों और पदयात्राओं के जरिए व्यवस्था परिवर्तन और रोजगार की बात करके इसी कमिटेड वोटर को अपनी ओर खिंचना चाहते हैं।
- चुनाव में किसी भी पार्टी की जीत-हार का फैसला यही न्यूट्रल वोटर करता है। यदि भाजपा अपने कोर वोट बैंक के साथ इस वर्ग को ठोस नीतियां (जैसे नौकरी, स्टार्टअप, औद्योगिक विकास) दिखाकर नहीं साधती, तो प्रशांत किशोर की पार्टी इस वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकती है।

बांकीपुर उपचुनाव के रिजल्ट के अगले दिन यानी 4 अगस्त को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुलाकात की। उनके साथ केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी थे।
3. भाजपा को विकास के रास्ते लौटना होगा, जंगलराज का डर काम नहीं करेगा
बिहार की कुल आबादी का 50% से अधिक हिस्सा युवाओं (35 वर्ष से कम) का है। इस पीढ़ी ने 1990 के दशक के कथित ‘जंगलराज’ के दौर को अपनी आंखों से ना देखा है और ना महसूस किया है। उनके लिए 20-25 साल पुरानी कानून-व्यवस्था चुनावी मुद्दा नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और जीवन स्तर प्राथमिकताएं हैं।
पहले मतदाताओं के पास RJD और BJP-JDU गठबंधन का ही विकल्प था। जो मतदाता RJD के अतीत से आशंकित रहते थे, वे विकल्पहीन होकर BJP-JDU का समर्थन करते थे। प्रशांत किशोर के उभार से मतदाताओं को एक ऐसा गैर राजद विकल्प मिल सकता है, जिस पर 90 के दशक का कोई राजनीतिक बोझ या अतीत का निगेटिव ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है।
- प्रशांत किशोर की पदयात्रा और भाषणों का मुख्य केंद्र राज्य के बजट, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन जैसे विषय रहे हैं।
- उन्होंने राजनीति के पारंपरिक समीकरणों (जाति और अतीत का डर) को चुनौती देकर ‘विकास के रोडमैप’ को बहस का मुख्य बिंदु बनाया है, जिससे अन्य प्रमुख दलों को भी अपने आर्थिक एजेंडे को आगे रखने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
- अब भाजपा सिर्फ लोगों को यह कह कर नहीं डरा सकती कि हमको जिताओ नहीं तो ‘जंगलराज’ आ जाएगा। वोटरों को अपने से जोड़े रखना है तो BJP को बिहार में उद्योग-धंधे लगाने, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन को लेकर स्पष्ट रोडमैप जनता के सामने पेश करना होगा। वरना वोटर प्रशांत किशोर की तरफ खिसक सकते हैं।
क्योंकि…
- भाजपा लंबे समय से बिहार में सत्ता (JDU के साथ गठबंधन में) में रही है। नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के मुताबिक, बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, जहां एक बड़ी आबादी बुनियादी सुविधाओं, स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है।
- आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है।बिहार से श्रमिकों और युवाओं का पलायन गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती है। बड़ी संख्या में आज भी स्टूडेंट्स को हायर एजुकेशन के लिए और नौकरी के लिए दूसरे राज्य जाना पड़ता है।
