‘रात के 2 बजे हैं. पूरा हॉस्टल जाग रहा है. लेकिन यह जागना एग्जाम के टेंशन या लैपटॉप की खटर-पटर के कारण नहीं है. असल में ये उन छात्रों की बेचैनी है जो गर्मी, उमस और पसीने के कारण सो नहीं पा रहे. छत के पंखे लगातार घूम तो रहे हैं, मगर ठंडक देने के लिए नहीं, ये सिर्फ गर्म हवा को इधर-उधर धकेल रहे हैं. दिनभर सूरज की तपिश सोख चुकी दीवारें अब भी गर्मी छोड़ रही हैं. वहीं बाहर आधी रात के बाद भी तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं आता.’
ऐसे माहौल में देश के इंजीनियरिंग कैंपसों में छात्र पसीने से भीगे कमरों में लेटे रहते हैं, इस उम्मीद में कि शायद थकान ही उन्हें नींद दे दे. ये वो छात्र हैं जो कड़ी परीक्षा से गुजरकर आईआईटी जैसे सपने को जीने आए हैं. इनकी ये रातें इनकी हर सुबह पर तारी रहती हैं. इस गर्मी का असर क्लासरूम और लैब तक पहुंच रहा है.
आईआईटी में रह रहे छात्र बताते हैं कि रात भर जागने के बाद सुबह क्लासरूम में आंखों में जैसे नींद आकर बसना चाहती है. ऐसे में लेक्चर धुंधले लगने लगते हैं. ध्यान भटकता है. फिर चिड़चिड़ापन बढ़ता है. इस तरह फ्यूचर के ये (करोड़ या अरबपति)
कम नींद और ज्यादा गर्मी के साथ पूरा दिन काटते हैं.
सम्बंधित ख़बरें
हीटवेव जब रातों को मुश्किल कर दे…
भारत में हीटवेव यानी गर्म हवाएं या लू अब सिर्फ दोपहर की समस्या नहीं है. अब रातों में भी ये हवाएं जलाती हैं. इस हालात में शरीर को आराम मिलने का जो एकमात्र समय होता था, वो भी नहीं मिल पा रहा है. सोचिए जब तापमान बार-बार 40 डिग्री पार कर रहा है और कई शहरों में 45 डिग्री तक पहुंच रहा है, तब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों के भीतर एक शांत लेकिन गंभीर संकट खड़ा होता है.

वो जमाने कुछ और थे…
असल में जब ये आईआईटी और उनके हॉस्टल बने तब देश में जलवायु परिवर्तन यानी टेंपरेचर इतना नहीं बढ़ा था. ये हॉस्टल अपेक्षाकृत ठंडा हुआ करते थे. लेकिन अब बदलती जलवायु के सामने वो पुरानी तकनीक कमजोर पड़ रही है. खराब वेंटिलेशन, भीड़भाड़ वाले कमरे और बढ़ती रात की गर्मी हॉस्टलों को लगातार थकान और तनाव की जगह बना रहे हैं.
अब सवाल सिर्फ ये नहीं रह गया है कि गर्मी अनकम्फर्टेबल है या नहीं. सवाल यह है कि क्या छात्र ऐसे देश में पढ़, सो और सफल हो सकते हैं जहां रातें भी ठंडी नहीं होतीं.

धरती गर्म हो रही है, तो हॉस्टल क्यों नहीं बदल रहे?
दुनिया लगातार बढ़ती गर्मी के दौर में प्रवेश कर चुकी है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने चेतावनी दी है कि आने वाले पांच वर्षों में वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर के आसपास ही बना रह सकता है.
जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2024 से 2028 के बीच कम से कम एक साल ऐसा होने की 80 प्रतिशत संभावना है, जब वैश्विक तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की अहम सीमा को अस्थायी रूप से पार कर जाएगा और संभवतः 2023 को भी सबसे गर्म साल के रूप में पीछे छोड़ देगा.
भारत पहले से ही इस वास्तविकता को जी रहा है. भारतीय मौसम विभाग लगातार सामान्य से अधिक तापमान और अधिक हीटवेव दिनों की चेतावनी दे रहा है. कई क्षेत्रों में इस गर्मी में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार करने की आशंका है. इसके बावजूद देश के अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों का ढांचा अब भी पुराने मौसम के हिसाब से बना हुआ है. आखिर इसे बदला क्यों नहीं जा रहा?
बता दें कि कई पुराने IIT कैंपस दशकों पहले बनाए गए थे, उस वक्त हॉस्टल ऐसे डिजाइन किए गए थे कि प्राकृतिक हवा, छायादार गलियारों और पंखों से पूरी राहत मिलती थी, तब एयर कंडीशनिंग की जरूरत इतनी नहीं थी. ये मान लिया गया था कि कमरों में हवा ही काफी होगी. लेकिन, आज यह धारणा टूटती दिखाई दे रही है.
एक ज्यादा गर्म और कठोर होते भारत के सामने पुराने कैंपस संघर्ष कर रहे हैं, जहां सूर्यास्त के बाद भी गर्मी कम नहीं होती और छात्र रातभर उसी में फंसे रहते हैं.
हॉस्टल के कमरे के अंदर असली गर्मी कैसी लगती है?
छात्रों के लिए कूलिंग की बहस कोई सैद्धांतिक चर्चा नहीं है. यह सीधे शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ा अनुभव है. IIT खड़गपुर के छात्र देव साहनी बताते हैं कि गर्मियों में हॉस्टल जीवन पढ़ाई से ज्यादा सहनशक्ति की परीक्षा बन जाता है. वो कहते हैं, ‘खड़गपुर में तापमान 35 डिग्री होता है, लेकिन महसूस 42 जैसा होता है. और हमसे उम्मीद की जाती है कि हम ऐसे ही रहें.’ वो आगे कहते हैं कि हमारे हॉस्टल कमरों में AC नहीं है. कुछ कॉमन एरिया में है, लेकिन जिन कमरों में हम सोते हैं, पढ़ते हैं और आराम करते हैं, गर्मियों में वे दमघोंटू हो जाते हैं.
सबसे कठिन समय आधी रात के बाद शुरू होता है.
कई छात्र नहाकर शरीर नहीं पोंछते, ताकि त्वचा पर बची पानी की ठंडक उन्हें सोने में मदद करे. फिर भी नींद बार-बार टूटती रहती है. देव कहते हैं कि अब बात सिर्फ असुविधा की नहीं रही. ‘यह हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. कई छात्रों को बार-बार डिहाइड्रेशन हो रहा है. मुझे खुद पिछले हफ्ते हीट एक्सॉशन की वजह से गंभीर दस्त हो गए.’
2022 से IIT खड़गपुर के कुछ हॉस्टलों में AC स्टडी एरिया और सीनियर छात्रों के लिए AC कमरे शुरू किए गए हैं. IIT रुड़की की एमटेक छात्रा बियास चक्रवर्ती कहती हैं कि गर्मियों में परीक्षा के समय लाइब्रेरी या स्टडी रूम में जगह मिलना मुश्किल हो जाता है. तब छात्रों के पास सिर्फ दो विकल्प रहते हैं कि वो निजी कूलर खरीदें या गर्मी सहें. वो तो ये भी कहती हैं कि अगर AC के लिए अतिरिक्त फीस देनी पड़े तो मैं देने को तैयार हूं. IIT में बाकी चीजें भी सब्सिडी के साथ मिलती हैं.
वह आगे कहती हैं कि अजीब लगता है कि IIT खड़गपुर और IIT रुड़की की फीस में मुश्किल से 5 हजार रुपये का अंतर है, लेकिन खड़गपुर के कुछ नए हॉस्टलों में छात्रों को सिंगल AC कमरे मिलते हैं.
गौरतलब है कि छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ गर्मी नहीं है बल्कि यह फीलिंग भी है कि उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा. कई छात्र बताते हैं कि उन्होंने वार्डन, मेंटर्स और प्रशासन से बार-बार शिकायत की, लेकिन बदलाव बहुत धीमा है. और दिलचस्प बात यह है कि छात्र विलासिता नहीं मांग रहे.
देव कहते हैं कि हम कोई एहसान नहीं मांग रहे. हम पैसे देने को तैयार हैं. बस रहने लायक कमरे चाहिए. क्योंकि अभी वे रहने लायक नहीं हैं. देव की यही बात एक बड़े भाव को सामने लाती है कि पढ़ाई करना ‘सर्वाइवल की जंग’ नहीं होना चाहिए.
पूरे IIT कैंपस को ठंडा करना इतना मुश्किल क्यों है?
एयर कंडीशनिंग की मांग सुनने में आसान लगती है, लेकिन संस्थानों के लिए यह बेहद जटिल फैसला है. NGS ग्लोबल इंडिया के मैनेजिंग पार्टनर आशीष धवन बताते हैं कि हजारों कमरों में AC लगाना सिर्फ मशीन खरीदने का मामला नहीं है.
इसके लिए बड़े स्तर पर बिजली व्यवस्था अपग्रेड करनी पड़ती है. नई वायरिंग, ट्रांसफॉर्मर क्षमता बढ़ाना, लोड बैलेंसिंग और लंबी अवधि का रखरखाव ढांचा बनाना जरूरी होता है. इसका आर्थिक बोझ बहुत बड़ा होता है. शुरुआती लागत भी और हर महीने की बिजली व मेंटेनेंस लागत भी.
यहीं संस्थानों के सामने कठिन सवाल खड़ा होता है. सीमित संसाधन हॉस्टल कूलिंग पर खर्च किए जाएं या लैब, रिसर्च, फैकल्टी भर्ती, स्कॉलरशिप और इनोवेशन पर? यही इस बहस का केंद्र है.
क्या छात्रों से अब भी कहा जा रहा है ‘एडजस्ट करो’?
इस मुद्दे के पीछे एक पुरानी संस्थागत मानसिकता भी काम करती है. अधिकांश IIT कैंपस पहले से AC लाइब्रेरी, लेक्चर हॉल, लैब, कंप्यूटर सेंटर और कॉमन स्पेस उपलब्ध कराते हैं. लंबे समय तक यह माना गया कि छात्र दिनभर वहीं रहते हैं और हॉस्टल कमरे सिर्फ सोने के लिए होते हैं.
इसके पीछे एक संस्कृति भी रही है ये संस्कृति असल में संघर्ष को गौरव समझने की है. यहां कम नींद, कठिन परिस्थितियों और असुविधा के बीच पढ़ाई करना IIT छात्र की पहचान का हिस्सा माना जाता रहा है.
IIT कानपुर के निदेशक मनींद्र अग्रवाल कहते हैं,’हीटवेव नई बात नहीं है. जितना मुझे याद है, गर्मी हमेशा से रही है.’ लेकिन अब रात में बढ़ती गर्मी इस सोच की सीमाएं दिखाने लगी है. जब रात ही आराम न दे सके, तो पढ़ाई पर असर पड़ना तय है.
अभी कैंपस में गर्मी से कैसे निपट रहे हैं?
कई संस्थान फिलहाल बड़े बदलाव के बजाय अस्थायी समाधान अपना रहे हैं. अग्रवाल बताते हैं कि हम छात्रों को हॉस्टल में कूलर इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं. कैंपस में कई AC स्पेस हैं जहां छात्र आराम करते हैं, और कभी-कभी अत्यधिक गर्मी में वहीं सो भी जाते हैं. यानी पूरी तरह AC हॉस्टल फिलहाल संभव नहीं, लेकिन राहत देने की कोशिश जारी है. फिर भी जब छात्र रात में गर्म कमरों में लौटते हैं, तो ये व्यवस्थाएं अधूरी लगती हैं.
क्या इस साल की गर्मी सच में अलग है?
प्रशासन के कुछ लोग मानते हैं कि गर्मी हमेशा से चक्रीय रही है. अग्रवाल कहते हैं कि इस साल कुछ विशेष असामान्य नहीं है. लेकिन जलवायु वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अब गर्मी सिर्फ ज्यादा नहीं हो रही बल्कि लंबी और रात तक टिकने वाली बन रही है. और बदलती जिंदगी की असली कहानी दोपहर नहीं, रातें लिख रही हैं.

जब छात्र ज्यादा फीस दे रहे हैं, तो बदले में क्या मिलना चाहिए?
IIT की पढ़ाई अब पहले से कहीं महंगी हो चुकी है. बीटेक फीस आम तौर पर प्रति सेमेस्टर 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है. चार साल की कुल लागत हॉस्टल और मेस सहित लगभग 8 से 12 लाख रुपये तक जाती है.
साथ ही 2026–27 के केंद्रीय बजट में IITs के लिए 12,123 करोड़ रुपये आवंटित किए गए जो पिछले वर्ष से 6.82 प्रतिशत अधिक है.
ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि जब छात्र अधिक भुगतान कर रहे हैं और संस्थानों को अधिक सरकारी फंड मिल रहा है, तो क्या बुनियादी छात्र सुविधाएं भी उसी गति से सुधर रही हैं?
देश में अब 23 IIT हैं, जो राष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष स्थान बनाए हुए हैं. लेकिन शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता पर बहस अब तेज हो रही है.
क्या रिसर्च, छात्र सुविधा से पहले आनी चाहिए?
दिलचस्प रूप से कई छात्र और पूर्व छात्र खुद भी इस मुद्दे को संतुलित नजर से देखते हैं. आशीष धवन बताते हैं कि कई IIT ग्रेजुएट मानते हैं कि AC कमरे जीवन आसान जरूर बनाएंगे, लेकिन वे चाहते हैं कि संस्थान पहले रिसर्च और अकादमिक ढांचे को मजबूत करें.
यह IIT संस्कृति की गहरी सोच को दिखाता है जहां बौद्धिक महत्वाकांक्षा को शारीरिक आराम से ऊपर रखा गया. लेकिन जलवायु परिवर्तन इस प्राथमिकता को चुनौती दे रहा है. क्योंकि जब गर्मी नींद, स्वास्थ्य और ध्यान को प्रभावित करने लगे, तब ‘आराम’ और ‘क्षमता’ अलग नहीं रह जाते.
गर्मी से बचने का मौका किसे मिलता है और किसे नहीं?
गर्मी का बोझ सभी छात्रों पर बराबर नहीं पड़ता. कुछ छात्र निजी आवास ले सकते हैं, कूलिंग डिवाइस खरीद सकते हैं या बार-बार घर जा सकते हैं. लेकिन कई छात्र पूरी तरह हॉस्टल व्यवस्था पर निर्भर होते हैं. नए IIT जैसे IIT जोधपुर पहले ही एयर-कूल्ड या AC रेजिडेंशियल मॉडल अपनाने लगे हैं.
पुराने कैंपसों के लिए बदलाव कठिन है, क्योंकि इमारतें और बिजली ढांचा पुराने हैं. जो कभी ‘साझा संघर्ष’ की संस्कृति दिखती थी, वह अब असमान परिस्थितियों को भी छिपाने लगी है.
क्या IIT अब बदलना शुरू कर रहे हैं?
धीमी गति से ही सही, बदलाव शुरू हो चुका है. अग्रवाल बताते हैं कि IIT कानपुर में बनने वाले नए हॉस्टल अब AC को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जा रहे हैं. लेकिन पुराने हॉस्टलों को अपग्रेड करना कहीं ज्यादा कठिन है. वो कहते हैं, ‘वे शुरुआत से AC के लिए बने ही नहीं थे. उन्हें बदलने में समय और सावधानी दोनों लगेगी.’ यह बयान भारतीय उच्च शिक्षा की बड़ी सच्चाई को दर्शाता है यानी अब संस्थानों को जलवायु के अनुसार खुद को बदलना ही होगा.

जब सहन करना ही व्यवस्था बन जाए…
पंखा अब भी घूम रहा है.
गर्मी अब भी बढ़ रही है.
इन दोनों के बीच भारत की शिक्षा व्यवस्था अपने अतीत और कठिन भविष्य के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. संस्थानों को रिसर्च, पहुंच, इंफ्रास्ट्रक्चर और किफायत आदि सबके बीच संतुलन बैठाना है. लेकिन जलवायु परिवर्तन प्राथमिकताओं को बदलने पर मजबूर कर रहा है. क्योंकि सवाल यह नहीं है कि छात्र गर्मी सह सकते हैं या नहीं.
वे पहले से सह रहे हैं.
असल सवाल यह है, क्या उन्हें सहना ही चाहिए?
एक गर्म होते भारत में मजबूती का मतलब असुविधा सहना नहीं होना चाहिए. मजबूती का मतलब होना चाहिए ऐसी व्यवस्था बनाना जहां सीखना ‘सर्वाइवल’ की शर्तों पर निर्भर न हो.
—- समाप्त —-
